Human Behavior - Introduction

हम कौन हैं ? 
किस कारण से मनुष्य को कुछ लोग अच्छे लगते हैं तथा कुछ लोग बुरे ? 
ये अच्छा और बुरा अनुभव क्या हैं, ये किस कारण से महसूस होता हैं तथा कौन इसका निमार्ण करता हैं? 
क्या कोई ऐसा तरीका हैं जिसका अनुकरण करके हमेशा प्रसन्नचित्त रहा जा सके ?
ये डर क्या है ? क्या हम हमेशा के लिए भयमुक्त हो सकते है ? 
इत्यादि विचार जिनके मन में आते हैं उन सभी जीवो के लिए, प्रस्तुत प्रकरण प्रकाशित किया जा रहा हैं।

हम स्वयं आनंद स्वरूप है। स्वयं का अनुभव ही आनंद का अनुभव हैं।
इसीलिए मनुष्य हर समय आनंदित रहना पसंद करता हैं। मनुष्य केवल उन लोगों और कार्यो से ही प्यार करता हैं जिनसे वह आनंद का अनुभव कर पाता हैं। निरंतर अद्भुत आनंद का अनुभव करने की हमारी प्रबल इच्छा, इस वास्तविकता का प्रतक्ष्य प्रमाण है।

इस दृष्टिकोण की सन्दर्भ एवं उदाहरणों सहित व्याख्या:-

ऋग, यजुर एवं साम वेदो के तीन प्रमुख खंड - उपासना, कर्म एवं ज्ञान हैं। इसी ज्ञान खंड को, उपनिषद के रूप मैं भी पहचाना जाता हैं। अतः उपनिषद, वेद का ही अभिन्न अंग हैं।
उपनिषदों के अनुसार, मानव स्वभाव तीन गुणों का संयुक्त प्रभाव है। सत्, रजो और तमो इन तीन मुख्य गुणों के नाम हैं। सत् हमारा मूल गुण है, सत् का अभाव ही अन्य दोनों गुणों रजो और तमो की आभासित-उत्पत्ति का कारण हैं।

मनुष्य अपने कर्मो के निहित निर्णयों के द्वारा, अपने जीवनकाल में इन तीनो गुणों का अर्जन और विसर्जन करता रहता हैं जिसके फलस्वरूप उसे हर समय किसी ना किसी एक गुण का अनुभव होता ही रहता हैँ। सत् का अनुभव ही मनुष्य का सुख हैं एवं सत् का अभाव ही मनुष्य का दुःख हैं। इन तीन गुणों के प्रभाव के कारण, मनुष्य द्वारा किये गये निर्णय और कार्य को ही उसके व्यवहार के रूप में जाना जाता हैं। (मनुष्य द्वारा इन तीन गुणों के अनुभव के कारण, किये हुए निर्णय और कार्यो को ही, उसके व्यवहार के रूप में जाना जाता हैं।)

इन तीन मुख्य गुणों को हम निम्नलिखित व्यवहारिक लक्षणों के रूप में आसानी से पहचान सकते है :-
ज्ञान, एकात्मकता, निर्भयता, आनंद, समर्पित-प्रेम, शांति आदि सत् गुण (या सात्विक प्रवृत्ति) के व्यवहारिक स्वरुप है।
इक्क्षा, आकांक्षा, आशा, निराशा, महत्वकाँक्षा, असंतोष आदि रजो गुण (या राजसिक प्रवृत्ति) के व्यवहारिक स्वरुप है।
अहंकार, क्रोध, भय, ईर्ष्या, द्वेष, वासना, धोखा, हिंसा आदि तमो गुण (या तामसिक प्रवृत्ति) के व्यवहारिक स्वरुप है।

- समझदारी, संतोष, त्याग, जीवमात्र के प्रति करुणा एवं न्याय, धीरता, ध्यान एवं मनन, ईश्वर के प्रति समर्पण, सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता आदि व्यवहार मानव स्वभाव को सात्विक प्रवृत्ति को बढ़ाते हैं। इसके अलावा बिना फल की इक्षा से अथवा निर्भय होकर की गयी सेवा जैसे भोजन करवाना, चिकित्सा, शिक्षण, रक्षण, साहस, वीरता इत्यादि कर्तव्यपरायण कर्म होने के कारण सात्विक प्रवृत्ति को बढ़ाते हैं।
- उत्सुकता, उत्साह, उन्मांगता, चाहत, आशा या निराशा, चिंता, शंका, लालच, आदि व्यवहार मानव स्वभाव को राजसिक प्रवृत्ति  को बढ़ाते हैं।
- स्वयं को अनात्मा (यानी शरीर, मन, बुद्धि) मानकर किया गया - 'मैं' भाव (जैसे मैं फलाने कुल, वर्ण, धर्म, जाति, भाषा, शिक्षा कौशल या सामाजिक स्तर का हूँ ) - जिसे स्वार्थ भी कहा गया है, सांसारिक अनुभवों, साधनो, व्यक्ति या धन के प्रति मोह एवं आकर्षण, धोखाधड़ी, लूटपाट, अतिक्रमण, हिंसा, ईर्ष्या, घृणा(नफरत), क्रोधित होना, डरना या डराना, पीड़ित करना या पीड़ित होना आदि व्यवहार मानव स्वभाव को तामसिक प्रवृत्ति  को बढ़ाते हैं।

इसीलिए सात्विक कार्य करता हुआ मनुष्य हमेशा प्रसन्नचित्त यानी आनंदित रहता हैं।

इक्क्षाए, अपेक्षाए एवं आशाए मनुष्य के मन में जन्म लेती हैं और मन की तो प्रवर्ति ही चंचलता है, इसीलिए ये कभी पूर्ण नहीं हो पाती है। जो पूर्ण होती सी दिखायी पड़ती हें  उनके नष्ट या अपूर्ण रहने की संभावना बनी रहती है। तथा जो पूर्ण भी हो चुकी होती है वो और भी नयी नयी इक्षाओं, अपेक्षाओं, आशाओं एवं आशंकाओं को जन्म देती रहती हैं। ये ही क्रम निरंतर चलता रहता है और मनुष्य का जीवन बीत जाता हैं। इक्षा (अपेक्षा, आशा) के अपूर्ण रहने की सम्भावना को मानव डर के रूप में जनता है।

मनुष्य जिस रूप में स्वयं को पहचानता है, उसी प्रकार के विकार और विचार उसे घेरे रहते हैं।  यदि मनुष्य स्वयं को शरीर के रूप में पहचानता है तब उसे स्वयं और प्रियजनों के शरीर अस्वथ या नष्ट होने के विचार घेरे रहते है। जो स्वयं को मन के रूप में जानता है, वो हमेशा नयी नयी योजनाओ, शंकाओं, इक्षाओं से घिरा रहता हैं।  स्वयं को बुद्धि स्वरुप में जानने वाला हमेशा तर्क-वितर्क तथा ज्ञान अर्जित करने में लगा रहता हैं।  स्वयं और इस समस्त ब्रह्माण्ड को, एक ही ईस्वर स्वरूप में जानने वाले के मन, शरीर और बुद्धि हमेशा शान्तिपूर्ण आनंदित रहते हैं। 

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