जिंदगी खुल के जिएंगे

1.    ज़िन्दगी के मिजाज़ भी कुछ अजीब से है, दोस्तों 
       कभी एक लम्हे में सिमट जाती और कहीं एक उम्र भी कम पड़ जाती है।
       कभी तुझमें स्वयं को जी कर खुश रह लेता हूँ, 
       कभी ये कायनात भी कम पड़ जाती है।

2.    खामोश है ज़िंदगी इस कदर आज, जैसे पतझड़ में गुलशन मुस्कुराना भूल गए हो।

3.    तुमसे तो फकत सच ही कहा है, मैंने 
       अब तुम जानो, क्या सही किया हैं क्या गलत किया हैं।

4.    कोयल सी वो गा रही है मेरे मन में,
       जैसे कोई प्रेमधुन जगा रही है जीवन में।

       कैसे समझाऊ उसे, अब नहीं रहा वो संसारी (इस जीवन में)।
       जो संबंधो में भी स्वार्थ का व्यापार करता था
       तथा मृत्यु, रोग और अर्थहीनता से डरता था।
       जो सांसारिक सुखों में ही रमता था,
       और अन्ध इक्षाओं में फलता था।
       जो खुद को खुद से अलग समझ,
       बेगानी दुनिया में खुद की खोज करता था।
       (बेगानी दुनिया में रोज़ खुद की खोज में निकलता था)
       जो खुद गुलशन होकर भी, औरों की खुशबू पर मरता था।
       अंतः आनंद सागर होकर भी, पीड़ा की अग्नि में जलता था।
       चला गया, अब रहा नहीं वो, जो पल पल आहे भरता था
       सपनों की दुनियां में जी कर जो, इस दुनिया में मरता था।

5.    मैं तो वैरागी हूँ, स्वयं में ही खुश रह लेता हूँ।
       जो जैसा मिलता है उसे अपना जानकर, उसी में ही जी लेता हूँ।
       क्योंकि ये प्रकृति में ही तो हूँ,
       जलमें, थलमें, नभमें, मैं ही रोशन हूँ।

6.    बदल देंगे इस दौर को,
       जी कर अपनी जिन्दगनियाँ,
       लुटा देंगे प्यार सारा, दे कर सभी कुर्बानियां।
       भले ही न कद्र हो जमाने को निस्वार्थ प्यार की, 
       मिटा के अपनी शख्सियत हम मूरत बनेगे प्यार की।
       क्योंकि
       भूले नहीं है हम उस प्यार के एहसास को, 
       खुशियां जहां खिलखिलाती है (ज़िन्दगी के) उस दौर-ए-ख़ास को।

7.    जो टूट जाये आंधियो में, हम वो वृक्ष नहीं।
       जो बह जाये बारिशों में, हम वो मिट्टी नहीं।
       बिखर जाये जो शब्दों से, हम वो मन भी नहीं।
       हम तो संसार का आधार है, जो पूरे ब्रह्मांड में बसती है उस चेतना का विस्तार है।

8.    क्या कहूं किस दौर में हूँ ?
       आसमां में हूं या किसी शोर में हूँ।

9.    जो नहीं हूँ, वही तो मैं हूँ (दुनिया की नज़रों में)
       और जो मैं असल में हूँ वो दिखता कहाँ हूँ।

10.    जाने कब से ढूढ़ रहा हूं उस अनजाने अफ़साने को, 
         मेरा हो कर जो मुझमें नहीं है उस बेगाने से दीवाने को।    

11.    क्या खुद से अनजान हूं या यूँ ही बेवजह परेशान हूँ। 
         सोचता हूं क्या करूं क्या कहूं किससे कहूं, ये शब्दों का शोर ही तो मुझे जड़ से मिटाना है।

12.    रिश्ते, रिवाजों के जंगलों से बहुत दूर,
         हम तो एकात्मता के खुले मैदान में जीते है।
         न किसी से कुछ लेते है न किसी को कुछ कहते है, फिर भी हरदम खुशियों में हम जीते हैं।

13.    मंज़िल भी हूँ कारवाँ भी हूँ मैं।
         जिसकी तलाश है वो हमसफ़र भी हूँ मैं।
         जानता हूँ पहचानता भी हूँ खुद को,
         फिर भी ना जाने क्योँ
         खुद ही की तलाश में भटकता फिरता हूँ।

14.    खुश हूँ खुद को तुममें पाकर,
         ग़मज़दा भी हूँ तुमसे दूर रहकर।
         काश, ये शरीरों का फासला न होता
         औऱ इन विचारों का आसरा न होता
         तब शायद, कुछ अलग ही होती ये ज़िन्दगी।


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